1. बरसते बादल
उ. वर्षा से पानी मिलता है। पानी न हो तो पेड़-पौधे भी न होंगे। पृथ्वी पर जीवन भी न होगा। बिना पेड़, पानी
व जीवन के धरती की शोभा भी न होगी।
2. घने बादलों का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
उ. घने बादल आने से चारों ओर अँधेरा छाने लगता है। मेघ गरजने लगते हैं। मौसम में शीतलता आ जाती है। प्रकृति का कण-कण प्रसन्न दिखने लगता है।
3. वर्षा ऋतु में नदियों के सौंदर्य पर अपने विचार बताइए।
उ. वर्षा नदियों का यौवनकाल माना जाता है। इस समय नदियाँ जल से लबलबा जाती हैं। वे ऋतु प्रसन्न
होकर उछलती, खेलती बहती जाती हैं। इन दिनों नदियों को देखने से मन को एक विशेष प्रकार शांति का अनुभव होता है।
3. कवि चाहता है कि जीवन में सावन बार बार आये और सब मिलकर झूलों में झूलें।
उ. इंद्रधनुष के झूले में झूलें मिल सब जन, फिर-फिर आये जीवन में सावन मनभावन।
लिखिए
1. इन प्रश्नों के उत्तर चार-पाँच पंक्तियों में लिखिए।
1. वर्षा के समय सबकी अनुभूति अलग - अलग होती है। बताइए आपकी अनुभूति कैसी होती होगी?
उ. वर्षा ऋतु मुझे बहुत पसंद है। इन दिनों मेरा मन बारिश में खेलने को करता है। मन करता है कि कागज की नाथ बनाकर पानी में बहाऊँ। मैं चाहता हूँ कि वर्षा के समय मेरे मित्र घर से बाहर निकले और हम बारिश में फुटबॉल खेलें।
2. वर्षा के समय प्रकृति बहुत ही सुंदर दिखाई पड़ती है। इस समय मेघ, बिजली और बैंद की विशेषता होती है?
उ. वर्षा ऋतु आते ही प्रकृति प्रसन्न दिखने लगती है। मेघ झम-झम बरसते हैं। पेड़ों से छनकर बुँदें छम धरती पर गिरती है इन बूंदों में संगीत सुनाई देता है बिजली चमचमाती है। लोगों के मन में तरहन के सपने जलने लगते है। बारिश की बूंदे पाकर पेड़-पौधे, पशु और लोग खुशी से झूम उठते हैं।
3. क्या की मूंदे धरती का रूप बदल सकती हैं। कैसे?
उ. वर्षा से जल मिलता है। जल के बिना जीवन संभव नहीं है। जल से फसलों की सिंचाई होती है। जल से हरियाली आती है। जल पेड़-पौधों को हरा-भरा रखता है नदियों को जल से भर देता है। जल से सारी धरती पर हरियाली छा जाती है। इस प्रकार वर्षा की बूंदें धरती का रूप बदल सकती है।
II. इन प्रश्नों के उत्तर आठ-दस पंक्तियों में लिखिए।
1. प्रायः सभी लोग सावन का बार-बार आना पसंद करते हैं। क्यों?
उ. सावन का महीना बहुत सुहावना होता है। यह कवियों का प्रिय महीना है इस महीने में प्रकृति का कण कण प्रसन्न हो जाता है। ऐसा लगता है मानों प्रकृति गीत गा रही हो। प्राणि-आणि में उल्लास दिखाई देता है। झील, नदियों, तालाब, नहर आदि भर जाते हैं। चारों ओर हरियाली छा जाती है। सावन की वर्षा फसल की दृष्टि से भी बड़ी लाभदायक है। इन दिनों गर्मी लगभग समाप्त हो जाती है। ऐसा लगता है जैसे बारिश की बूंदें धरती की प्यास बुझा रही हों। इसी कारण सभी लोग सावन का बार-बार आना पसंद करते है।
2 कविता का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उ. 'बरसते बादल' कविता के कवि सुमित्रानंदन पंत जी हैं प्र्तुत कविता में सावन महीने की वर्षा ऋतु का
मनोहर वर्णन है। पंतजी का कहना है कि सावन ऋतु की वर्षा बहुत सुंदर होती है। इस ऋतु में मेघ झम झम बरसते हैं। ऐसा लगता है कि पेड़ों से छनकर बूँदे छम-छम नाच रही है। धरती पर गिरती बैंदों में संगीत सुनाई देता है। बादल के हृदय पर बिजली चमचमाती है। वर्षा के कारण चारों ओर अँधेरा छा जाता है। लोगों के मन में तरह-तरह के सपने जगने लगते हैं यह दृश्य बड़ा मनोहारी होता है। पंतजी कहते हैं कि वर्षा ऋतु आते ही सभी जीव-जंतु प्रसन्न हो जाते हैं। प्रकृति खिल उठती है। मेंढक टर-टर बोलते हैं। मोर 'म्यक्स' गाते हैं। चातक पक्षी पीउ-पीउ' की रट लगाते हैं। मेघ घुमड़-घुमड़ कर गरजते और बरसते हैं। टपकते बूंदों में एक संगीत होता है जो मन को छू लेता है। जन-जन का रोम-रोम सिहर उठता है। आकाश धरती पर गिरती हुई जल-धाराएँ मनभावन लगती हैं। कवि-हृदय इन जलधाराओं के संग झूला झूलने लगता है। कवि लोगों को सावन के गीत गाने के लिए कहता है। उन्हें सावन का भरपूर आनंद लेने के लिए प्रेरित करता है। लोगों को इंद्रधनुष के झूले में झूलने को कहता है। साथ ही यह सावन मनभावन को बार-बार आने का निमंत्रण भी देता है।
पढ़िए
1. वाक्य सीधा करके लिखिए।
1. है झम - झम बरसते झम-झम मेघ के सावन।
2. गगन में गर्जन घुमड़-घुमड़ गिर भरते मेघ।
3. धरती पर झरती धाराएँ पर धाराओं।
उ. 1. झम-झम-झम-झम मेघ बरसते हैं सावन के।
2. घुमड़-घुमड़ गिर मेघ गगन में भरते गर्जन।
3. धाराओं पर धाराएँ झरती धरती पर
II. नीचे दिये गये भाव की पंक्तियाँ लिखिए।
1. बादलों के घोर अंधकार के बीच बिजली चमक रही है और मन दिन में ही सपने देखने लगा है।
उ. चम-चम बिजली चमक रही रे उर में घन के, थम-थम दिन के तम में सपने जगते मन के।।
2. मिट्टी के कण - कण से कोमल अंकुर फूट रहे हैं।
उ. रिमझिम-रिमझिम क्या कुछ कहते बूंदों के स्वर, रोम सिहर उठते छूते वे भीतर - अंतर। धाराओं पर धाराएँ झरती धरती पर, रज के कण-कण में तृण-तृण को पुलकावलि भर।।
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